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	<title>द्रोणाचार्य के गुरु का नाम Archives - Welcome To Ind Lives News, Latest News Hindi, Breaking News in Hindi, Live Hindi News Headlines, Top News India, Current Hindi News World, Entertainment News Hindi, Sports News Hindi, Cricket News Hindi, Business News Hindi, Popular Videos - IndLives.com</title>
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		<title>बिना माँ के जन्मे थे कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्य, जानिए दोनों की जन्म की कथा dharam</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Jan 2019 19:28:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बिना माँ के जन्मे थे कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्य, जानिए दोनों की जन्म की कथा dharam dharam दुनिया के बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्य का जन्म कैसे हुआ. जी हाँ, इसी के साथ बहुत कम लोग इस बात से भी वाकिफ है कि दोनों ने बिना माँ के जन्म [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h2>बिना माँ के जन्मे थे कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्य, जानिए दोनों की जन्म की कथा dharam</h2>
<p>dharam</p>
<p>दुनिया के बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्य का जन्म कैसे हुआ. जी हाँ, इसी के साथ बहुत कम लोग इस बात से भी वाकिफ है कि दोनों ने बिना माँ के जन्म लिया था. अगर आप भी उन्ही में से एक है जिन्हे इनके जन्म की कथा नहीं पता तो आइए आज हम आपको बताते हैं इनके जन्म की कथा.</p>
<p><a title="" href="http://indlives.com/take-such-home-home-happiness-peace-prosperity-aaj-ka-rashifal/" target="_blank" rel="noopener">अपने घर में ऐसे लाएं सुख, शांति और समृद्धि Aaj Ka Rashifal</a></p>
<p>पौराणिक कथा – गौतम ऋषि के पुत्र का नाम शरद्वान था. उनका जन्म बाणों के साथ हुआ था. उन्हें वेदाभ्यास में जरा भी रुचि नहीं थी और धनुर्विद्या से उन्हें अत्यधिक लगाव था. वे धनुर्विद्या में इतने निपुण हो गये कि देवराज इन्द्र उनसे भयभीत रहने लगे. इन्द्र ने उन्हें साधना से डिगाने के लिये नामपदी नामक एक देवकन्या को उनके पास भेज दिया. उस देवकन्या के सौन्दर्य के प्रभाव से शरद्वान इतने कामपीड़ित हुये कि उनका वीर्य स्खलित हो कर एक सरकंडे पर आ गिरा. वह सरकंडा दो भागों में विभक्त हो गया जिसमें से एक भाग से कृप नामक बालक उत्पन्न हुआ और दूसरे भाग से कृपी नामक कन्या उत्पन्न हुई.</p>
<p>कृप भी धनुर्विद्या में अपने पिता के समान ही पारंगत हुये. भीष्म जी ने इन्हीं कृप को पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा-दीक्षा के लिये नियुक्त किया और वे कृपाचार्य के नाम से विख्यात हुये.गौतम ऋषि के पुत्र का नाम शरद्वान था. उनका जन्म बाणों के साथ हुआ था. उन्हें वेदाभ्यास में जरा भी रुचि नहीं थी और धनुर्विद्या से उन्हें अत्यधिक लगाव था. वे धनुर्विद्या में इतने निपुण हो गये कि देवराज इन्द्र उनसे भयभीत रहने लगे. इन्द्र ने उन्हें साधना से डिगाने के लिये नामपदी नामक एक देवकन्या को उनके पास भेज दिया. उस देवकन्या के सौन्दर्य के प्रभाव से शरद्वान इतने कामपीड़ित हुये कि उनका वीर्य स्खलित हो कर एक सरकंडे पर आ गिरा. वह सरकंडा दो भागों में विभक्त हो गया जिसमें से एक भाग से कृप नामक बालक उत्पन्न हुआ और दूसरे भाग से कृपी नामक कन्या उत्पन्न हुई. कृप भी धनुर्विद्या में अपने पिता के समान ही पारंगत हुये. भीष्म जी ने इन्हीं कृप को पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा-दीक्षा के लिये नियुक्त किया और वे कृपाचार्य के नाम से विख्यात हुये. कालान्तर में उसी यज्ञ पात्र से द्रोण की उत्पत्ति हुई. द्रोण अपने पिता के आश्रम में ही रहते हुये चारों वेदों तथा अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में पारंगत हो गये. द्रोण के साथ प्रषत् नामक राजा के पुत्र द्रुपद भी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तथा दोनों में प्रगाढ़ मैत्री हो गई. उन्हीं दिनों परशुराम अपनी समस्त सम्पत्ति को ब्राह्मणों में दान कर के महेन्द्राचल पर्वत पर तप कर रहे थे. एक बार द्रोण उनके पास पहुँचे और उनसे दान देने का अनुरोध किया. इस पर परशुराम बोले, “वत्स! तुम विलम्ब से आये हो, मैंने तो अपना सब कुछ पहले से ही ब्राह्मणों को दान में दे डाला है. अब मेरे पास केवल अस्त्र-शस्त्र ही शेष बचे हैं. तुम चाहो तो उन्हें दान में ले सकते हो.”</p>
<p>द्रोण यही तो चाहते थे अतः उन्होंने कहा, “हे गुरुदेव! आपके अस्त्र-शस्त्र प्राप्त कर के मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी, किन्तु आप को मुझे इन अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा-दीक्षा देनी होगी तथा विधि-विधान भी बताना होगा.” इस प्रकार परशुराम के शिष्य बन कर द्रोण अस्त्र-शस्त्रादि सहित समस्त विद्याओं के अभूतपूर्व ज्ञाता हो गये. शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात द्रोण का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी के साथ हो गया. कृपी से उनका एक पुत्र हुआ. उनके उस पुत्र के मुख से जन्म के समय अश्व की ध्वनि निकली इसलिये उसका नाम अश्वत्थामा रखा गया.</p>
<p>किसी प्रकार का राजाश्रय प्राप्त न होने के कारण द्रोण अपनी पत्नी कृपी तथा पुत्र अश्वत्थामा के साथ निर्धनता के साथ रह रहे थे. एक दिन उनका पुत्र अश्वत्थामा दूध पीने के लिये मचल उठा किन्तु अपनी निर्धनता के कारण द्रोण पुत्र के लिये गाय के दूध की व्यवस्था न कर सके. अकस्मात् उन्हें अपने बाल्यकाल के मित्र राजा द्रुपद का स्मरण हो आया जो कि पाञ्चाल देश के नरेश बन चुके थे. द्रोण ने द्रुपद के पास जाकर कहा, “मित्र! मैं तुम्हारा सहपाठी रह चुका हूँ. मुझे दूध के लिये एक गाय की आवश्यकता है और तुमसे सहायता प्राप्त करने की अभिलाषा ले कर मैं तुम्हारे पास आया हूँ.” इस पर द्रुपद अपनी पुरानी मित्रता को भूलकर तथा स्वयं के नरेश होने के अहंकार के वश में आकर द्रोण पर बिगड़ उठे और कहा, “तुम्हें मुझको अपना मित्र बताते हुये लज्जा नहीं आती? मित्रता केवल समान वर्ग के लोगों में होती है, तुम जैसे निर्धन और मुझ जैसे राजा में नहीं.”अपमानित होकर द्रोण वहाँ से लौट आये और कृपाचार्य के घर गुप्त रूप से रहने लगे. एक दिन युधिष्ठिर आदि राजकुमार जब गेंद खेल रहे थे तो उनकी गेंद एक कुएँ में जा गिरी.</p>
<p>उधर से गुजरते हुये द्रोण से राजकुमारों ने गेंद को कुएँ से निकालने लिये सहायता माँगी. द्रोण ने कहा, “यदि तुम लोग मेरे तथा मेरे परिवार के लिये भोजन का प्रबन्ध करो तो मैं तुम्हारा गेंद निकाल दूँगा.” युधिष्ठिर बोले, “देव! यदि हमारे पितामह की अनुमति होगी तो आप सदा के लिये भोजन पा सकेंगे.” द्रोणाचार्य ने तत्काल एक मुट्ठी सींक लेकर उसे मन्त्र से अभिमन्त्रित किया और एक सींक से गेंद को छेदा.</p>
<p>फिर दूसरे सींक से गेंद में फँसे सींक को छेदा. इस प्रकार सींक से सींक को छेदते हुये गेंद को कुएँ से निकाल दिया. इस अद्भुत प्रयोग के विषय में तथा द्रोण के समस्त विषयों मे प्रकाण्ड पण्डित होने के विषय में ज्ञात होने पर भीष्म पितामह ने उन्हें राजकुमारों के उच्च शिक्षा के नियुक्त कर राजाश्रय में ले लिया और वे द्रोणाचार्य के नाम से विख्यात हुये.</p>
<p>द्रोणाचार्य का जन्म, द्रोणाचार्य का इतिहास, द्रुपद और द्रोणाचार्य, गुरु द्रोणाचार्य की कहानी, कृपाचार्य कथा, द्रोणाचार्य का वध, द्रोणाचार्य के गुरु का नाम, द्रोणाचार्य वध,</p>
<p>about dronacharya in telugu, ashwathama, dronacharya story in tamil, who killed dronacharya, drona and drupada, kripacharya incarnation, saraswati cursed dronacharya, dronacharya and arjun,</p>
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